This is a brilliant piece of poetry by Shankar Shailendra, the renowned Hindi poet. There was a time in my life when I had to be hospitalised with a rather serious condition- and these words, particularly the first and third stanzas were so instrumental in keeping my mood upbeat.
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।
ये ग़म के और चार दिन सितम के और चार दिन
ये दिन भी जाएँगे गुज़र गुज़र गए हज़ार दिन ।
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।
सुबह औ’ शाम के रंगे हुए गगन को चूम कर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से छूम छूम कर ।
तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।
हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न झल सकी चली गई वो हार कर ।
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।
हमारे कारवाँ का मंज़िलों को इंतज़ार है
ये आँधियों ये बिजलियों की पीठ पर सवार है ।
जिधर पड़ेंगे ये कदम बनेगी एक नई डगर ( version 2: तू आ कदम मिलाके चल चलेंगे एक साथ हम)
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।
ज़मीं के पेट में पली अगन पलें हैं ज़लज़ले
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये ।
मुसीबतों के सर कुचल बढ़ेंगे एक साथ हम
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।
बुरी है आग पेट की बुरे है दिल के दाग ये
न दब सकेंगे एक दिन बनेंगे इंक़लाब ये ।
गिरेंगे ज़ुल्म के महल बनेंगे फिर नवीन घर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है ।